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दुष्यन्त संग्रहालय में वो दिन वो उजाले में जयन्त देशमुख ने याद किये गर्दिश के दिन **** सब कुछ होने के बाद भी अजीब सा खालीपन लगता है : जयन्त देशमुख

दुष्यन्त संग्रहालय में वो दिन वो उजाले में जयन्त देशमुख ने याद किये गर्दिश के दिन
सब कुछ होने के बाद भी अजीब सा खालीपन लगता है : जयन्त देशमुख

    भोपाल। आज मेरे पास सब कुछ है। मैं कुछ बन सकूँ, ऐसा आई-बाबा चाहते थे। अब कुछ हैसियत बनी, तो आई-बाबा नहीं है ये सब देखने के लिए। जबकि मुझे याद है रायपुर में घर का किराया न चुका पाने पर रात में ही घर का सामान मकानमालिक ने बाहर फेंक दिया और हमें सारी रात कहीं और बैठकर बिताना पड़ी-कहते हुए भावुक हो गये सिनेमा और रंगमंच के लिए सुप्रसिद्ध श्री जयन्त देशमुख। वे दुष्यन्त कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय की वो दिन वो उजाले श्रृंखला में अपना अतीत साझा कर रहे थे।
    आरम्भ में दुष्यन्त कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय के निदेशक राजुरकर राज ने बताया कि संग्रहालय द्वारा आरम्भ की गई इस श्रृंखला पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अभी तक श्री लीलाधर मंडलोई एवं श्री रामप्रकाश त्रिपाठी, श्री श्याम मुंशी, श्री राजेश जोशी और श्री देवीसरन अपने संस्मरणात्मक अनुभव साझा कर चुके हैं। श्री आलोक चटर्जी ने श्री जयन्त देशमुख के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। स्वागत वक्तव्य श्रीमती ममता तिवारी ने दिया।
    श्री जयन्त देशमुख ने कहा कि फिल्म आँखें से उनके फिल्मी सफर में मोड़ आया। बतौर कला निदेशक उनकी यह पहली फिल्म थी, जबकि अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार उस फिल्म में थे। उन्होंने कहा कि भारत भवन और रायपुर के दिनों ने उन्हें बहुत ताकत दी है। उनका कहना है कि मुम्बई की चकाचौंध में भी मैं भोपाल और रायपुर को बराबर महसूस करता हूँ। यही कारण  है कि मैं मुम्बई जैसी जगह में भी खड़ा हूँ अपने दोनों पैरों पर। उन्होंने बताया कि जीवन में एक दौर ऐसा भी आया था जब अपना जीवन खत्म करने के इरादे से नींद की बहुत सारी गोलियाँ  खा ली थीं। उन्होंने अपनी आने वाली फिल्मों और धारावाहिकों के बारे में भी अपने अनुभव साझा किये।
 

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